भ्रम

हाँ,मैं  भ्रमित थी। 
और एक  दलदल में  फँसती चली जा रही थी। हालांकि  तालाब  में  कितने कमल खिले थे। मेरा लक्ष्य  तालाब तक पहुँचने का था लेकिन कितने  कंकड़ पत्थर राह में  अटके पड़ थे।
ऐसा भी होता है कि  हम  जिस आकर्षण  के  वशीभूत  किसी वस्तु  की ओर खींचे चले जाते हैं यह जाने बगैर  कि हमारे  सफ़र  का अंत दुखद भी हो सकता  है। 
हम मैं  सूरज  को  देखती थी नित्य सुबह।मुझे  उससे  अंतहीन  प्यार  हो गया था यह जाने  बगैर कि उसका स्वभाव जलना जलाना है। मैं  अपने ही शब्दों क्रियाकलापों के मकड़जाल में  उलझती चली जाती  थी।
मैं  रात भर अपने विचारों  की दुनिया  में  उलझती  रहती थी।
रात में  सूरज  दिखता नहीं  और मैं  सुबह का इंतज़ार  करती रहती थी ।
सूरज नित्य  मुझे  देखता और जाते जाते हर शाम मुझे  एक सुनहरे चादर से लिपटा जाता था ।
और जबतक मैं  उस सुनहरे चादर का मर्म समझ  पाती, मेरे विचारों  की दुनिया  ही बदल जाती थी ।
# कुंती 
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