हाँ, मैं जिंदा हूँ

 यह कैसे सम्भव हो  सकता  है?

ओ रात के  पहले  पहर की   ओसकण! मैं  दुनिया  की सबसे  सुखी इंसान  हूँ। 

फिरभी  ये बूँद कैसी  जो मेरी आँखों  से ढलती है!

रात  में  जब मैं  सोती हूँ तब कौन मेरी आत्मा  को निचोड़ कर मेरी देह से  निकाल लेता है?

चाँदनी  रात  में  क्यों  संकड़ी गलियों  में  बेइंतिहा भटकती हूँ!

सुबह  के धुंधलका में  ये कोहरा कैसा है जो हटने का  नाम  ही नहीं  लेता।





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