यह कैसे सम्भव हो सकता है? ओ रात के पहले पहर की ओसकण! मैं दुनिया की सबसे सुखी इंसान हूँ। फिरभी ये बूँद कैसी जो मेरी आँखों से ढलती है! रात में जब मैं सोती हूँ तब कौन मेरी आत्मा को निचोड़ कर मेरी देह से निकाल लेता है? चाँदनी रात में क्यों संकड़ी गलियों में बेइंतिहा भटकती हूँ! सुबह के धुंधलका में ये कोहरा कैसा है जो हटने का नाम ही नहीं लेता।
हाँ,मैं भ्रमित थी। और एक दलदल में फँसती चली जा रही थी। हालांकि तालाब में कितने कमल खिले थे। मेरा लक्ष्य तालाब तक पहुँचने का था लेकिन कितने कंकड़ पत्थर राह में अटके पड़ थे। ऐसा भी होता है कि हम जिस आकर्षण के वशीभूत किसी वस्तु की ओर खींचे चले जाते हैं यह जाने बगैर कि हमारे सफ़र का अंत दुखद भी हो सकता है। हम मैं सूरज को देखती थी नित्य सुबह।मुझे उससे अंतहीन प्यार हो गया था यह जाने बगैर कि उसका स्वभाव जलना जलाना है। मैं अपने ही शब्दों क्रियाकलापों के मकड़जाल में उलझती चली जाती थी। मैं रात भर अपने विचारों की दुनिया में उलझती रहती थी। रात में सूरज दिखता नहीं और मैं सुबह का इंतज़ार करती रहती थी । सूरज नित्य मुझे देखता और जाते जाते हर शाम मुझे एक सुनहरे चादर से लिपटा जाता था । और जबतक मैं उस सुनहरे चादर का मर्म समझ पात...
चाँदनी रात ___सागर में ऊँची ऊँची लहरें उठती हैं। लगता है ज़ोर से तूफ़ान आने वाला है। लेकिन जब सूर्योदय हुआ तब लहरें शांत थी। एक मछुआ दूसरे मछुआ से कहता है ___ "बंधु! आज बहुत दिनों बाद आसमान साफ़ नज़र आ रहा है। " दूसरा मछुआ कहता है___"हाँ साथी, समुद्र का पानी भी गहरा नीला है। आज खूब मछलियां मिलेंगी।" दोनों मछुवे खुश होकर समुद्र में अपनी नाव खोल देते हैं।
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